मोहाली:- राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (नाईपर), एस.ए.एस. नगर (मोहाली), पंजाब में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन आयुरिनफॉर्मेटिक्स (AI²) विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इस सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सूचना विज्ञान, औषधि विज्ञान तथा आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान के समन्वय के माध्यम से औषधि खोज और स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
स्वागत संबोधन में नाईपर, मोहाली के निदेशक प्रो. दुलाल पांडा ने कहा कि भारत आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा और वैश्विक पहचान के कारण एक विशिष्ट स्थान रखता है। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की वैज्ञानिक समझ को व्यापक बनाने, उनकी पहुंच बढ़ाने तथा वैश्विक बाजार में उनकी संभावनाओं को सशक्त करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एआई के माध्यम से आयुर्वेदिक औषधीय योगों के प्रभावों का रोगियों की जीनोमिक एवं प्रोटीओमिक प्रोफाइल के संदर्भ में गहन अध्ययन किया जा सकता है, जिससे साक्ष्य-आधारित और व्यक्तिगत उपचार पद्धतियों के विकास का मार्ग प्रशस्त होगा। प्रो. पांडा ने आयुर्वेदिक उपचारों की प्रभावकारिता और सुरक्षा स्थापित करने के लिए बड़े स्तर पर तथा विशिष्ट उद्देश्यों के साथ नैदानिक परीक्षण किए जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि नाईपर, मोहाली विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग को मजबूत करने तथा आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के चिकित्सकों के बीच सेतु के रूप में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है। एआई-सक्षम अनुसंधान के माध्यम से दोनों चिकित्सा प्रणालियों के समन्वय से रोगियों के उपचार परिणामों में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि AI² जैसे सम्मेलन सार्थक सहयोग को बढ़ावा देंगे और इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोलेंगे।
सम्मेलन के आयोजक डॉ. राजेंद्र कुमार ने अपने संबोधन में आयुरिनफॉर्मेटिक्स के क्षेत्र में एआई की परिवर्तनकारी क्षमता और सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि नाईपर, मोहाली पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान और एआई-आधारित औषधि खोज के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस संदर्भ में SARS-CoV-2 तथा अल्जाइमर रोग के लिए औषधि खोज, उन्नत आणविक मॉडलिंग तथा हर्बल जैव-सक्रिय घटकों और औषधीय योगों की बहु-लक्ष्यीय कार्यप्रणाली की पहचान जैसे अनुसंधान क्षेत्रों का उल्लेख किया गया।
प्रो. पी. वी. भरताम ने आधुनिक औषधि खोज में सूचना विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते महत्व के बारे में जानकारी दी । उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खोज को गति देने और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नवीन दृष्टिकोण विकसित करने हेतु सूचना विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान तथा आयुर्वेदिक ज्ञान का एकीकृत उपयोग आवश्यक है।
केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) के उप महानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने विशेष संबोधन दिया। उन्होंने बताया कि सैकड़ों पादप प्रजातियों के औषधीय गुणों को अनुसंधान के माध्यम से स्थापित किया जा चुका है। उन्होंने पारंपरिक औषधीय ज्ञान और आयुर्वेद की उपयोगिता को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एआई के उपयोग पर बल दिया। साथ ही, जैव-औषधीय अनुसंधान पर आधारित औषधि खोज को आगे बढ़ाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
सीएसआईआर–पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) की प्रमुख प्रो. वी. सत्तिगेरी सम्मेलन के मुख्य वक्ता थे जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान के लिए औपचारिक बौद्धिक संपदा संरक्षण की अपर्याप्तता से उत्पन्न चुनौतियों और इसके दुरुपयोग की आशंका पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत की समृद्ध पारंपरिक औषधीय विरासत को अनुचित पेटेंट दावों से सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार द्वारा समयबद्ध हस्तक्षेप तथा TKDL जैसी पहलों के महत्व को रेखांकित किया।
हाइब्रिड मोड में आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, औषधि अनुसंधान और आयुर्वेद के अंतर्संबंधों से उभरती संभावनाओं पर विशेषज्ञ व्याख्यान एवं चर्चा आयोजित की जा रही हैं। सम्मेलन के पहले दिन देश के विभिन्न हिस्सों से 117 प्रतिभागियों ने भाग लिया। यह सहभागिता पारंपरिक चिकित्सा और एआई-आधारित स्वास्थ्य नवाचार के क्षेत्र में अंतर्विषयक अनुसंधान के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाती है।
यह सम्मेलन भारत की समृद्ध आयुर्वेदिक विरासत को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, डेटा-आधारित और वैश्विक स्तर पर उपयोगी स्वास्थ्य समाधानों में परिवर्तित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आधुनिक औषधीय अनुसंधान और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को एक मंच पर लाकर नाईपर मोहाली पारंपरिक ज्ञान और समकालीन साक्ष्य-आधारित चिकित्सा के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास कर रहा है।इस पहल का व्यापक उद्देश्य अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी उपचारों की खोज को गति देना, आयुर्वेदिक औषधीय योगों के वैज्ञानिक सत्यापन को मजबूत करना, भारत के पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करना तथा सहयोगात्मक अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है, ताकि देश की समृद्ध औषधीय विरासत का लाभ विश्वभर के रोगियों तक पहुंचाया जा सके।