वो भी क्या दिन थे… जब गांव में हर घर अपना हुआ करता था…?
टिहरी जनपद:- बागी–मैठाणगांव की उन सुनहरी यादों को समर्पित, जब गांव केवल बसा नहीं था—बल्कि जिया करता था…
टिहरी जनपद की ग्राम सभा बागी में कभी बागी और मैठाणगांव एक ही ग्राम सभा का हिस्सा हुआ करते थे। वह समय आज भले ही इतिहास के पन्नों में सिमट गया हो, लेकिन उसकी स्मृतियां आज भी मन के किसी कोने में उसी तरह जीवित हैं।
तब गांव के लोग केवल पड़ोसी नहीं थे, एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी थे। पूरा गांव एक बड़े परिवार की तरह रहता था। किसी के घर में खुशी होती तो हर आंगन में रौनक आ जाती और किसी के घर दुःख आता तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो जाता।
गांव की पहचान केवल उसके खेत-खलिहानों और मकानों से नहीं थी, बल्कि उसकी गढ़वाली संस्कृति, परंपराओं, मेल-मिलाप और सामूहिक जीवन से थी। भंडारा, मंडाण, रामलीला और पांडवलीला जैसे आयोजन गांव के जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे।
शादी-ब्याह भी पूरे गांव का उत्सव होता था
उस समय किसी एक घर में शादी-विवाह या कोई मांगलिक कार्यक्रम होता, तो वह केवल उस परिवार का आयोजन नहीं होता था—पूरा गांव उसमें अपना योगदान देता था।
मालू के पत्ते लाकर पत्तल-दौने तैयार किए जाते, भोजन पकाने के लिए लकड़ियां जुटाई जातीं और घर-घर से लोग अपनी सिलबट्टियां लेकर आते। महिलाएं और गांव की मातृशक्ति मिलकर दाल पीसतीं, पकौड़े बनातीं और तरह-तरह के पारंपरिक पकवान तैयार करतीं।
अरसे तो जैसे हमारी पहाड़ी रसोई की आत्मा हुआ करते थे। गांव की मातृशक्ति ओखली में चावल कूटती और बड़े प्रेम से अरसे तैयार करती। उन अरसों का स्वाद और खुशबू ऐसी होती कि महीनों बाद भी उनकी मिठास और ताजगी बरकरार रहती।
बागी गांव के मुड़ीगार नमक तोक के खेतों में पैदा होने वाले सुगंधित बासमती चावल, जिन्हें गांव में ‘हंसराज’ कहा जाता था, की खुशबू तो अपने आप में एक पहचान थी। किसी एक घर में हंसराज चावल पकते तो उसकी सुगंध जैसे पूरे गांव के वातावरण में फैल जाती थी।
जब पांडवलीला पूरे गांव की धड़कन बन जाती थी
गांव में पांडवलीला का आयोजन भंडारे के रूप में लगभग सप्ताहभर तक चलता था। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि गांव की कला, संस्कृति और सामूहिक चेतना का उत्सव होता था।
गांव के अनेक सुप्रसिद्ध कलाकार और महानुभाव इसमें अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इनमें स्वर्गीय श्री पातेराम बिजल्वाण जी, स्वर्गीय श्री धर्म दत्त बिजल्वाण जी, स्वर्गीय श्री बनवारी लाल बिजल्वाण जी, स्वर्गीय श्री प्रेम सिंह नेगी जी, स्वर्गीय श्री महिमानंद बिजल्वाण जी, श्री कुंदन सिंह नेगी जी सहित अनेक कलाकारों का योगदान अविस्मरणीय रहा।
गांव की मातृशक्ति में स्वर्गीय श्रीमती द्रोपती दादी भी पूरे उत्साह और आत्मीयता के साथ नृत्य एवं अन्य प्रस्तुतियां देती थीं।
और जब ढोल-दमाऊं की गूंज वातावरण में उठती तथा गांव के सुप्रसिद्ध ढोल वादक स्वर्गीय श्री पुशु दास जी अपनी विशिष्ट बजंतरी शैली में ढोल बजाते, तो मानो पूरा गांव उस धुन में समा जाता था। दूर-दूर से लोग इस अद्भुत लोक-सांस्कृतिक परंपरा को देखने और सुनने के लिए एकत्रित होते थे।
रामलीला—जहां पूरा गांव कलाकार भी था और दर्शक भी
रामलीला का आयोजन भी उसी उत्साह और सामूहिक भावना से होता था। स्वर्गीय डॉक्टर तारा दत्त बिजल्वाण जी के मार्गदर्शन में रामलीला का मंचन गांव की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था।
मंच छोटा हो सकता था, संसाधन सीमित हो सकते थे, लेकिन कलाकारों का उत्साह और दर्शकों का प्रेम असीम था।
खेती भी अकेले की नहीं, पूरे गांव की होती थी
जिस परिवार के पास अधिक जमीन होती, उसके खेती-किसानी के काम में पूरा गांव सहयोग करता था। गुड़ाई, रोपाई और खेती के अन्य कार्य सामूहिक रूप से किए जाते।
ढोल-दमाऊं और मासकबाज की धुन के साथ गांव के लोगों को बुलाया जाता और फिर सब मिलकर खेतों में काम करते। काम के बीच हलवा खिलाने की परंपरा भी होती थी।
वह दृश्य कितना अद्भुत रहा होगा—
खेतों में काम करते लोग, गूंजता ढोल-दमाऊं, हंसी-ठिठोली और सामूहिक श्रम की भावना…
वह खेती केवल अन्न पैदा नहीं करती थी, रिश्ते भी पैदा करती थी।
शामें भी कितनी आत्मीय हुआ करती थीं…
शाम ढलते ही कई घरों में गांव के लोग एकत्रित हो जाते। कहीं हुक्के की गुड़गुड़ाहट सुनाई देती तो कहीं गर्मागर्म दूध की महक।
लोग देर रात तक बैठते, लोककथाएं, दंतकथाएं और पुरानी स्मृतियां सुनाते और सुनते। न मोबाइल था, न टेलीविजन, न सोशल मीडिया—फिर भी मनोरंजन की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि एक-दूसरे की संगत ही सबसे बड़ा मनोरंजन थी।
दुःख भी किसी एक परिवार का नहीं होता था
और सबसे बड़ी बात—गांव में यदि किसी परिवार पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ता और किसी अपने का स्वर्गवास हो जाता, तो वह परिवार अपने दुःख में कभी अकेला नहीं रहता था।
हर घर से अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैणां और भोजन सामग्री भेजी जाती। इतना सामान इकट्ठा हो जाता कि शोकाकुल परिवार को कई दिनों तक भोजन की चिंता नहीं करनी पड़ती।
लोग केवल संवेदना व्यक्त करने नहीं आते थे,
वे दुःख को बांटने आते थे।
यदि किसी घर में दूध की कमी हो जाती, तो पड़ोस ही नहीं, दूर-दूर के लोग भी अपने घर का दूध लेकर पहुंच जाते। कई बार तो इतना दूध एकत्र हो जाता कि उस परिवार ने शायद अपने पूरे प्रयास से भी उतना दूध कभी न जुटाया होता।
न कोई हिसाब…
न कोई स्वार्थ…
न किसी उपकार का अहसास…
बस एक सरल-सी भावना—
“आज तुम्हें मेरी जरूरत है, कल मुझे तुम्हारी होगी।”
वो समय साधनों से गरीब, मगर संवेदनाओं से अमीर था
आज जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है—तब हमारे पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन हमारे पास एक-दूसरे के लिए बहुत कुछ था।
घर छोटे थे, मगर दिल बड़े थे।
साधन सीमित थे, मगर सहयोग असीम था।
जेबें हल्की थीं, मगर रिश्ते बहुत भारी थे।
जीवन कठिन था, मगर उसमें अपनापन बहुत था।
आज गांव बदल गए हैं। समय बदला है। जीवन की गति बदली है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन कहीं न कहीं वह सामूहिकता, वह भाईचारा, वह पड़ोसी धर्म और वह निःस्वार्थ अपनापन धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से दूर होता चला गया है।
कभी-कभी मन करता है कि समय की घड़ी को थोड़ा पीछे घुमा दें…
फिर वही ढोल-दमाऊं सुनाई दें,
फिर वही मंडाण सजे,
फिर पांडवलीला की रातें लौट आएं,
फिर रामलीला के संवाद गांव की गलियों में गूंजें,
फिर ओखली में चावल कूटती मातृशक्ति दिखाई दे,
फिर सिलबट्टियों पर दाल पिसे,
फिर अरसों की खुशबू घर-घर महके,
फिर हंसराज चावल की सुगंध पूरे गांव में फैल जाए,
और फिर किसी एक घर की खुशी में पूरा गांव मुस्कुरा उठे।
काश! वो दिन फिर लौटकर आते…
जहां किसी का दुःख पूरे गांव का दुःख होता था,
किसी की खुशी पूरे गांव की खुशी होती थी,
किसी के खेत में काम होता था तो पूरा गांव जुट जाता था,
किसी के घर चूल्हा बुझता था तो दूसरे घर से भोजन पहुंच जाता था,
और किसी घर में दूध नहीं होता था तो दूर का पड़ोसी भी अपना दूध लेकर पहुंच जाता था।
शायद वो दिन पूरी तरह वापस न आएं…
लेकिन उन दिनों की इंसानियत, संस्कृति और अपनत्व को हम अपनी आने वाली पीढ़ियों तक जरूर पहुंचा सकते हैं।
क्योंकि—
गांव केवल मिट्टी, मकानों और खेतों से नहीं बनता।
गांव बनता है साझा स्मृतियों से,
परंपराओं से,
एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़े होने से,
और उन धड़कते हुए दिलों से
जो कहते हैं—
“तुम अकेले नहीं हो… पूरा गांव तुम्हारे साथ है।”
यही था हमारा बागी–मैठाणगांव…
और यही हमारी सबसे अनमोल विरासत है।
लेखक जगदंबा प्रसाद बिजल्वाण द्वारा लिखित आर्टिकल में लेखक की अपने विचार व सुझाव हैं।