‘आज जाने की जिद न करो…’ पर ठहर गई शाम, ‘हज़ार ख्वाहिशें’ ने छेड़े दिल के तार
सेक्टर-10 के म्यूजियम ऑडिटोरियम में सजी ग़ज़लों की महफिल, मेहंदी हसन, गुलाम अली, जगजीत सिंह और निदा फ़ाज़ली की रचनाओं ने बांधा समां
चंडीगढ़:- “आज जाने की जिद न करो…” के सुर छिड़े तो सेक्टर-10 का म्यूजियम ऑडिटोरियम जैसे कुछ पल के लिए ठहर गया। इसके बाद “हज़ार ख्वाहिशें ऐसी…” और “चुपके चुपके रात दिन” जैसे नग्मों ने महफिल को ऐसा रंग दिया कि श्रोता देर तक सुरों में डूबे रहे। कहीं मोहब्बत की नरमी थी, कहीं जुदाई की कसक और कहीं जिंदगी के फलसफे—हर प्रस्तुति के बाद तालियों से ऑडिटोरियम गूंजता रहा।
मौका था ‘शाम-ए-ग़ज़ल’ का। नॉर्थ जोन कल्चरल सेंटर, पटियाला, मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर, भारत सरकार की ओर से चंडीगढ़ सिटीजन फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में मुंबई और जयपुर के कलाकारों ने ग़ज़ल की नफासत, शायरी और संगीत का संगम पेश किया।
वकार खान ने छेड़े सुर, मशहूर ग़ज़लों से बांधा समां
मुंबई से उस्ताद ताज़े खान के बेटे वकार खान की टीम ने लोकप्रिय ग़ज़लों से महफिल को सुरमयी बनाया। “दिल ही दुखाने के लिए”, “हज़ार ख्वाहिशें”, “जब तुम साजदा”, “चुपके चुपके रात दिन”, “आज जाने की जिद न करो” और “बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी” जैसी ग़ज़लों ने श्रोताओं को बांधे रखा।
मेहंदी हसन, गुलाम अली और जगजीत सिंह की गायकी की याद दिलाने वाले इन नग्मों ने महफिल में पुरानी ग़ज़लों का नॉस्टैल्जिक रंग भर दिया।
मदन जयपुरी के सुपुत्र और पद्मश्री हरिहरन के शागिर्द डॉ. सुनील राही ने ग़ज़ल की बारीकियां दिखाईं
जयपुर के जाने-माने ग़ज़ल गायक और संगीतकार डॉ. सुनील राही ने अपनी प्रस्तुतियों से महफिल को एक अलग रंग दिया। उन्होंने ग़ज़ल गायकी की बारीकियां अपने पिता और ग़ज़लकार स्वर्गीय मदन जयपुरी से सीखीं। इसके साथ ही वे पद्मश्री हरिहरन के शागिर्द भी रहे हैं। डॉ. राही ‘खजाना ग़ज़ल टैलेंट हंट-2023’ के विजेता रह चुके हैं।
राही ने डॉ. ताहिर फ़राज़ की “काश ऐसा कोई मंज़र होता” से शुरुआत की। इसके बाद निदा फ़ाज़ली की मशहूर रचना “होश वालों को खबर क्या” ने माहौल को और भावुक कर दिया। निदा फ़ाज़ली की “हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी” में जिंदगी और समाज की तस्वीर उभरी, जबकि “अपना कोई मिले तो गले से लगाइए” ने महफिल में अपनापन घोल दिया। “नग़्में हैं, शिकवे हैं” की प्रस्तुति के साथ राही ने सुरों की इस शाम को यादगार बना दिया।
ग़ज़ल की खासियत यही रही कि यहां सिर्फ गीत नहीं गाए गए, बल्कि हर शेर को उसके एहसास के साथ श्रोताओं तक पहुंचाया गया। मुंबई और जयपुर के कलाकारों ने सुर, शब्द और संगीत का ऐसा संगम पेश किया कि सेक्टर-10 की यह शाम खत्म होने के बाद भी श्रोताओं के बीच देर तक गूंजती रही।