चंडीगढ़ PGIMER में ग्लोबल फैटी लिवर डे पर एक रोगी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

विशेषज्ञों ने बचपन में फैटी लिवर रोग की रोकथाम हेतु शीघ्र कार्रवाई का आह्वान किया

चंडीगढ़ :- पीजीआईएमईआर, चंविशेषज्ञों ने बचपन में फैटी लिवर रोग की रोकथाम हेतु शीघ्र कार्रवाई का आह्वान कियाडीगढ़ के उन्नत बाल चिकित्सा केंद्र (एपीसी) स्थित बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग ने ग्लोबल फैटी लिवर डे के अवसर पर एक रोगी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम का मुख्य विषय बाल्यावस्था फैटी लिवर रोग (मेटाबोलिक डिस्फंक्शन-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिज़ीज़ – MAFLD) रहा, जिसमें बच्चों और किशोरों में इस बीमारी के बढ़ते बोझ पर प्रकाश डालते हुए स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसकी रोकथाम के महत्व पर बल दिया गया।

बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी क्लिनिक, एडवांस्ड पीडियाट्रिक्स सेंटर (एपीसी), पीजीआईएमईआर में आयोजित इस कार्यक्रम में रोगियों, उनके अभिभावकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, प्रशिक्षुओं तथा सारथी पहल से जुड़े स्कूली बच्चों ने भाग लिया। ये बच्चे युवा स्वास्थ्य दूतों के रूप में अपने विद्यालयों एवं समुदायों में स्वस्थ जीवनशैली और रोग-निवारण संबंधी जागरूकता फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

कार्यक्रम का नेतृत्व प्रो. साधना लाल, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग ने किया। उनके साथ डॉ. देवी दयाल, प्रोफेसर, बाल अंतःस्रावी विज्ञान विभाग; डॉ. राकेश कुमार, प्रोफेसर, बाल अंतःस्रावी विज्ञान विभाग; डॉ. जैविंदर यादव, अतिरिक्त प्रोफेसर, बाल अंतःस्रावी विज्ञान विभाग तथा डॉ. चेन्नकेशव टी., सहायक प्रोफेसर, बाल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी विभाग उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने रोगियों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के साथ विस्तृत संवाद करते हुए बचपन में मोटापा, मेटाबोलिक विकार, मधुमेह का जोखिम, यकृत स्वास्थ्य, जीवनशैली संबंधी हस्तक्षेप और दीर्घकालिक रोग-निवारण से जुड़े विषयों पर चर्चा की।

सभा को संबोधित करते हुए प्रो. साधना लाल ने कहा कि फैटी लिवर रोग अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों में भी तेजी से पाया जा रहा है, विशेषकर उन बच्चों में जो मोटापे, निष्क्रिय जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों से ग्रस्त हैं। उन्होंने बताया कि इस रोग को अब मेटाबोलिक डिस्फंक्शन-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिज़ीज़ (MAFLD) कहा जाता है क्योंकि यह शरीर में मौजूद अंतर्निहित मेटाबोलिक गड़बड़ियों को दर्शाता है।

उन्होंने कहा, “बच्चों में फैटी लिवर रोग एक महत्वपूर्ण जनस्वास्थ्य चिंता के रूप में उभर रहा है। यद्यपि प्रारंभिक चरण में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन यह भविष्य में गंभीर मेटाबोलिक और हृदय संबंधी रोगों का प्रारंभिक संकेत हो सकता है।” उन्होंने चेतावनी दी कि बचपन में अनुपचारित फैटी लिवर रोग आगे चलकर उच्च रक्तचाप, टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग, स्ट्रोक और मोटापे से संबंधित अन्य जटिलताओं का कारण बन सकता है। रोकथाम के महत्व पर बल देते हुए प्रो. लाल ने कहा, “रोकथाम की शुरुआत बचपन से होती है। स्वस्थ खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सीमित सेवन जीवनशैली से जुड़ी फैटी लिवर बीमारी के कई मामलों को रोक सकता है और उन्हें उलट भी सकता है। बच्चों में ये आदतें विकसित करने और स्वस्थ वातावरण बनाने में अभिभावकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

फैटी लिवर रोग की बढ़ती व्यापकता, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह समस्या लगभग प्रत्येक चार मोटे बच्चों में से एक को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा, “जागरूकता और प्रारंभिक जांच अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह रोग अक्सर तब तक अनदेखा रह जाता है जब तक जटिलताएं विकसित नहीं हो जातीं। हमारा उद्देश्य परिवारों और युवाओं को आवश्यक जानकारी देकर बच्चों को आजीवन स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों से बचाना और उनके लिए स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करना है।”

डॉ. देवी दयाल ने रोकथाम के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, “वयस्कों को प्रभावित करने वाले कई गैर-संचारी रोगों की जड़ें बचपन में ही होती हैं। बचपन में स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने वाले हस्तक्षेप जीवनभर लाभ प्रदान कर सकते हैं तथा फैटी लिवर रोग सहित अनेक मेटाबोलिक विकारों की रोकथाम में सहायक हो सकते हैं।”

समस्या के मेटाबोलिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. राकेश कुमार ने कहा, “फैटी लिवर रोग का मोटापे और मेटाबोलिक विकारों से गहरा संबंध है। बचपन में बढ़ता मोटापा फैटी लिवर के मामलों में वृद्धि का प्रमुख कारण बन रहा है। स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम और स्क्रीन टाइम में कमी भविष्य में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के बोझ को काफी हद तक कम कर सकती है।” परिवार और समुदाय की भूमिका पर जोर देते हुए डॉ. जैविंदर यादव ने कहा, “बच्चे अपने आसपास के वातावरण से आदतें सीखते हैं। जब अभिभावक, विद्यालय और स्वास्थ्य विशेषज्ञ मिलकर स्वस्थ व्यवहार को बढ़ावा देते हैं, तब हम बच्चों में मोटापे और फैटी लिवर रोग के बढ़ते बोझ को प्रभावी रूप से नियंत्रित कर सकते हैं।”

डॉ. चेन्नकेशव टी. ने प्रारंभिक पहचान और निगरानी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, “बच्चों में फैटी लिवर रोग अक्सर बिना किसी लक्षण के होता है और वर्षों तक पहचान में नहीं आता। मोटापे, पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी और अन्य मेटाबोलिक जोखिम कारकों वाले बच्चों की समय पर जांच से रोग की शीघ्र पहचान संभव है तथा गंभीर यकृत क्षति को रोका जा सकता है।” कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को संतुलित पोषण, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन नियंत्रण तथा मीठे पेय पदार्थों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सीमित सेवन के महत्व के बारे में जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने जोखिम वाले बच्चों के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और फाइब्रोस्कैन जैसी जांच विधियों पर भी चर्चा की।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण सारथी से जुड़े स्कूली बच्चों की सक्रिय भागीदारी रही। उन्होंने विशेषज्ञों के साथ संवाद किया और स्वस्थ जीवनशैली के संदेशवाहक बनने का संकल्प लिया। संवादात्मक गतिविधियों और शैक्षिक सत्रों के माध्यम से विद्यार्थियों ने स्वस्थ भोजन, नियमित व्यायाम और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के महत्व को समझा। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अपने परिवारों, विद्यालयों और समुदायों तक स्वास्थ्य संबंधी संदेश पहुंचाने के लिए सशक्त बनाना था, ताकि प्रारंभिक अवस्था से ही स्वास्थ्य जागरूकता की संस्कृति विकसित की जा सके।

कार्यक्रम का समापन एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ, जिसमें रोगियों, अभिभावकों और सारथी छात्र स्वयंसेवकों ने बाल्यावस्था फैटी लिवर रोग की रोकथाम, निदान और दीर्घकालिक प्रबंधन से संबंधित विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्राप्त किया। इस आयोजन ने निवारक स्वास्थ्य सेवाओं, रोगी शिक्षा और सामुदायिक सहभागिता के प्रति पीजीआईएमईआर की प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया तथा यह दर्शाया कि जीवनशैली संबंधी रोगों से मुकाबला करने और स्वस्थ भविष्य के निर्माण में बच्चों और परिवारों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

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