डायबिटिक रेटिनोपैथी से एक करोड़ से अधिक भारतीयों की आंखों की रोशनी को खतरा
चंडीगढ़:- मधुमेह अब केवल शुगर तक सीमित बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह आंखों की रोशनी के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। भारत में डायबिटीज से पीड़ित लोगों में एक करोड़ से अधिक लोग डायबिटिक रेटिनोपैथी से प्रभावित हो सकते हैं। चिंता की बात यह है कि शुरुआती चरण में इस बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते और मरीज को इसका पता तब चलता है, जब आंखों की रोशनी प्रभावित होने लगती है।
विश्व मधुमेह दिवस (14 नवंबर) से पहले ग्रेवाल आई इंस्टीट्यूट (GEI), मेडिसिटी, न्यू चंडीगढ़ ने लोगों को नियमित रेटिना जांच करवाने की अपील की है। चंडीगढ़ प्रेस क्लब में संस्थान की जन-जागरूकता पहल ‘चिराग’ के तहत आयोजित प्रेस वार्ता में विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर जांच और उपचार से मधुमेह के कारण होने वाली 90 प्रतिशत से अधिक अंधता को रोका जा सकता है।
टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को निदान के समय ही हो सकती है आंखों की बीमारी
GEI के CEO एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. एस.पी.एस. ग्रेवाल ने कहा कि टाइप-2 डायबिटीज के कई मरीजों में बीमारी का पता चलने के समय ही डायबिटिक रेटिनोपैथी मौजूद हो सकती है, क्योंकि मधुमेह कई वर्षों तक बिना पहचान के रह सकता है। इसलिए आंखों की रोशनी सामान्य होने पर भी नियमित रेटिना जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत में मधुमेह के बढ़ते मामलों, निष्क्रिय जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर खानपान के कारण निवारक स्वास्थ्य जांच का महत्व और बढ़ गया है।
आधुनिक तकनीक से शुरुआती पहचान संभव
GEI की सीनियर कंसल्टेंट (विट्रियो रेटिना एवं यूवाइटिस) डॉ. मनप्रीत बराड़ ने कहा कि संस्थान आधुनिक डायग्नोस्टिक प्रणालियों और अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से आंखों की बीमारियों की शुरुआती पहचान और सटीक उपचार पर काम कर रहा है। चिकित्सकीय विशेषज्ञता के साथ नई तकनीक का इस्तेमाल मरीजों के बेहतर दृष्टि परिणाम सुनिश्चित करने में मददगार है।
भारत में एक करोड़ से अधिक मरीज प्रभावित होने की आशंका
GEI के डायरेक्टर (रेटिना सर्विसेज) डॉ. मंगत राम डोगरा ने बताया कि वर्ष 2022 में ‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ’ में प्रकाशित SMART India अध्ययन के अनुसार भारत में मधुमेह से पीड़ित लोगों में डायबिटिक रेटिनोपैथी का प्रसार 12.5 प्रतिशत है। इस अनुमान को देश में मधुमेह के मरीजों की संख्या पर लागू करें तो एक करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी की चपेट में हो सकते हैं।
उन्होंने 2025 में BMJ Open में प्रकाशित ग्रामीण उत्तर प्रदेश के सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के ऐसे 84.8 प्रतिशत मरीजों ने कभी रेटिना की जांच नहीं करवाई थी, जिन्हें पहले से मधुमेह का पता था। गंभीर डायबिटिक रेटिनोपैथी से पहचाने गए मरीजों में से केवल 15.4 प्रतिशत को उपचार मिला था।
डॉ. डोगरा ने कहा कि रेटिना की जांच को डायबिटीज के नियमित प्रबंधन का हिस्सा बनाना जरूरी है। टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को निदान के समय ही आंखों की व्यापक जांच करवानी चाहिए, जबकि टाइप-1 के मरीजों को निदान के पांच वर्षों के भीतर पहली जांच करवानी चाहिए। इसके बाद सामान्यतः हर साल जांच की सलाह दी जाती है।
उन्होंने बताया कि 2024 में दुनिया में 20 से 79 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 58.9 करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित थे। भारत में यह संख्या लगभग 8.98 करोड़ थी, जिसके 2050 तक बढ़कर 15.67 करोड़ होने का अनुमान है।
विशेषज्ञों ने बताया कि डायबिटिक रेटिनोपैथी में लंबे समय तक रक्त में शुगर का स्तर बढ़ा रहने से रेटिना की छोटी रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। धुंधला दिखाई देना, आंखों के सामने काले धब्बे या फ्लोटर्स दिखना और अचानक दृष्टि कम होना इसके चेतावनी संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि बेहतर शुगर नियंत्रण, नियमित रेटिना जांच और समय पर लेजर थेरेपी अथवा इंट्राविट्रियल इंजेक्शन जैसे उपचार से दृष्टि को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है। गर्भवती मधुमेह रोगियों और गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं के लिए भी रेटिना जांच महत्वपूर्ण है।